कर्म वृक्ष की छाँव में…

पेड़ का पका फल पेड़ के नीचे ही गिरता है . प्रकृति, प्रेम और परमात्मा ये तीन शब्द ऐसे हैं जो हमारे जीवन को बहुत प्रभावित करता है.प्रकृति का खेल ऐसा कि हर पल स्वीकारने के लिए मजबूर कर देता है.हमें अपने कर्मों की मुल्याँकन करना ही चाहिए.कितने बुरे कितने अच्छे कर्म किये.ये हमारी आत्मचिंतन का विषय है.विज्ञान मनोभावों को मनोदशा को नहीं दिखा सकता.कहते आत्मा अमर है.हमारे कर्मों के अनुरूप ही आत्मा को गति करनी पड़ती है जिसे विज्ञान अंधविश्वास मानती हैं.आज हमारी वर्तमान पीढ़ी डिजिटल हो गई किन्तु मानसिकता अनियंत्रित हो गई.प्राचीनकाल में राजा दसरथ को श्रवण के हत्या के परिणाम से आप अनभिज्ञ नही हैं .जय और विजय नाम के द्वारपालों के श्राप ,नारदमोह जैसे अनेकों दृष्टांत हैं जो हमें कर्मों के फल भोगने अर्थात आचरण को शुद्ध करने के लिए प्रेरित करती है.अनजाने में ही हमारे कर्म हमारीसुख की कामना करती है किन्तु हम भोगविलास में कर्मों की अनदेखा करते हैं.परिणामस्वरूप हमें दुःखों का सामना करना पड़ता है…

र्द तो दर्द है , जिससे सिहर उठता है दिल, क्यों न बन सका इंसान ही इंसान के काबिल ,
क्या वो नही थे मेरे हिन्दुस्तान के काबिल . मानवता भी शर्मिन्दा हुआ उस रात के अँधेरे में . सांप का जहर भी दिखने लगा सपेरे में .
दर्द तो दर्द है जिससे सिहर उठता है दिल .
क्यों न बन सका इंसान ही के काबिल ।
आज भी नजर आता है वो मंजर बेबसी का,
लुटती आबरु और मिटती जिन्दगी का
क्या इंसान भी हो जाता है इस कदर तंग दिल…
आखिर क्यों न बन सका इंसान ही इंसान के काबिल

सच कहूँ तो वो ही भगवान होते हैं …

अपनों को छोड़कर,गैरों पर मेहरबान होते हैं

गर सच कहूं तो वो ही भगवान होते हैं.

क्यों मिटती जा रही है समाजिकता की दौर

क्यों बढ़ती जा रही है दूरियँ और.

गर कर दे कुछ जनहित में भूलकर भी

कोई काम नया.

मानो गाथा वही महान होती है…

परछाई नापने चला …

जब चला मै अपनी परछाई नापने,

परछाई भी चला मेरी सच्चाई नापने

तन्हा रह न सका एक पल भी मै,

अब वो भी चला मेरी तन्हाई नापने.

मैं,मैं न रह सका,चाहकर भी कह न सका

मेरी फितरत में कोई कसर रह न सका.

दिल का तराजु लेकर चला मेरी अच्छाई नापने…

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